यूहीं गुज़रते गुज़रते,
यूहीं गुज़रते गुज़रते,
एक रोज़ एक सुबह मिल गयी,
फज्र मैं तुमने जो की थी वोह दुआ मिल गयी.
यूहीं गुज़रते गुज़रते...
यूहीं गुज़रते गुज़रते,
एक रोज़ एक धुप(after नून) मिल गयी,
गठरी मैं बंद गुड़ और रोटियाँ नर्म मिल गयी,
यूहीं गुज़रते गुज़रते...
यूहीं गुज़रते गुज़रते,
एक रोज़ एक शाम मिल गयी,
गुलाब से लिपटी एक चिठ्ठी मेरे नाम मिल गयी,
यूहीं गुज़रते गुज़रते...
यूहीं गुज़रते गुज़रते,
एक रोज़ एक रात मिल गयी,
तेरी भूली-बिसरी यादों की सौगात मिल गयी,
यूहीं गुज़रते गुज़रते...!
यूहीं गुज़रते गुज़रते...!
- समीर
Thursday, January 27, 2011
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